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Wednesday, June 28, 2017

बेचैनी



हाँ तुम्हारे यूँ दूर चले जाने से
एक शख्स मेरे अंदर उदास बैठा है
अलविदा नहीं होते अक्सर खुशमिज़ाज़ अंदाज़ के
यही सोच कर आँखों के बहुत पास बैठा है
तुम्हारे हाथों का वो कोमल सा स्पर्श
और मेरी हर बात पर होठों पर एक प्यारी सी हसी
तुम्हारा यूँ हर दफ़ा कुछ ना कुछ तोहफे देना
मेरे हर बार रूठ जाने पर चंद पलों में मना लेना
यही कुछ यादें समेट रहा हूँ वक़्त से
वक़्त है कि ओढ़ कर लिबास बैठा है
महसूस की थी मैंने तेरे दिल में वो कसक उस शाम
जो मुझे इत्मिनान से गले लगा कर पूरी होनी थी
और वो नज़रो से ही दूर तक साथ आना
ये अधूरा ही रह गया था
मुहब्बत आज बेचैन सी थी तेरे मेरे दरमियाँ
जोड़ लूँ सब लम्हे तेरे साथ में
की करने अब ये दिल नए कयास बैठा है
तेरे होठों पर मेरा नाम कांपता सा रह गया
पर तेरा चेहरा था कि सारा दर्द कह गया
थी आज खामोशियों के पास चीख़ती हुई जुबां
पर ये दिल था जो सब कुछ सह गया
कुछ अरमान और भी जगते हैं अब दिल में
जो झंझोड़ देते हैं मेरी रूह को
तड़प जाता हूँ मैं तुम्हे साथ ना सोच कर
मानो खुदा भी करने मुझसे अट्हास बैठा है 
हाँ तुम्हारे यूँ दूर चले जाने से
एक शख्स मेरे अंदर उदास बैठा है

- कमल पनेरू





Sunday, June 25, 2017

तसल्ली


कुछ अलसायी सी शामें फिर से दस्तक दे रही हैं
मैंने दरवाजो पर हुई वो धीमी सी आहट सुन ली है
होंगी जरूर वही पुरानी तुमसे लिपटी यादें
ये सोच कर मैं अंदर कहीं छुप गया हूँ
आज फिर धड़कन तेज़ होने लगी है
सोचता हूँ तुम आओ कभी और देखो
मेरे घर की पुरानी  दीवारें
जिनमे तुम्हारी अनगिनत तसवीरें हैं
वो किनारे पर लगाया तुलसी का पौधा
अब भी तुम्हारे हाथ से पानी मिलने के इंतज़ार में है
और अमरुद की डाली पर लटका वो टूटा सा झूला
मानो नाराज़ है अब तुम्हे ना पा कर
घर के आँगन पर अब धुप खिलती ही कहाँ है
वो रंग वो चमक न घर में है और न मेरे चेहरे पर
हाँ जहन में कुछ निशाँ हैं तुम्हारे चले जाने के
और एक उम्मीद है इन यादों के साथ तुम्हारे लौट आने की
साथ ही है झूटी तसल्ली की तुम अब भी मेरे हो!
- कमल पनेरु

Wednesday, June 14, 2017

थोड़ा मुस्कुरा दो ना


क्यूँ शांत से बैठे हो आज
थोड़ा मुस्कुरा दो ना
दिन भर की थकान से टूट गया है ये बदन
ये थकान मिटा दो ना
अक्सर होते हैं तुम्हारी खामोशियों में किस्से हज़ार
मुझे आज वो किस्से दो चार सुना दो ना
ऐसा सन्नाटा पहले कभी दरमियान नहीं रहा
अपनी फिर से वो आवाज़ सुना दो ना
मुहब्बत नहीं होती किसी फ़कीर की दुआ की मोहताज़
तुमसे ही सीखा है मैंने
की तुम खिलखिला के हँस पड़ो फिर से
मुझे ये अंदाज़ सीखा दो ना
गज़ब का फासला आ खड़ा हुआ है दो पल के दौरान
नज़दीकियाँ कैसे होती हैं मेहरबान सीखा दो ना
आज दोस्तों में कुछ जिक्र सा हुआ था तुम्हारा
मैं सहसहा खिलखिला पड़ा था लाज से
तुमने बिताया कैसे दिन मेरे बगैर
चंद लब्ज़ों में ये बात बता दो ना
क्यूँ शांत से बैठे हो आज
थोड़ा मुस्कुरा दो ना
       
- कमल पनेरू