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Saturday, August 19, 2017

अलग सा ही एहसास

बालाजी मंदिर से आने के बाद से कुछ अलग सा ही एहसास हो रहा है ! ना जाने क्यों ऐसा लग रहा है हर दम कोई मेरे साथ चल रहा है! डर सा लग रहा है हर वक़्त ! एक बेचैनी सी है जो अंदर ही अंदर खाये जा रही है! कभी अचानक से डर  नींद भी खुल जा रही है रात में.  मन सा लग ही नहीं रहा है किसी भी काम में. हर किसी को चिड़चिड़ापन सा हो रहा है ! जिस काम को करते हुए इतना वक़्त गुज़र गया है ऑफिस में, आज कॉन्फिडेंस ही नहीं है करने में. ऐसा लग रहा है की वो हर दम मुझे देख रहा है, हर वक़्त. अभी भी ! अभी भी  बगल में बैठे होने का एहसास हो रहा है! जब सोता हूँ रात में तो पता नहीं क्यूँ  ये डर होता है की मैं किसी दूसरी दुनिया में पहुंच जाऊंगा! जहाँ इंसान नहीं हैं एक भी!
पता नहीं आगे क्या होगा, ये बगल में बैठा शक्श न जाने क्या चाहता है मुझसे! 

Thursday, August 3, 2017

Blurb: Why Should I Love You...???


Have you ever wondered why your partner loves you? How would you feel if consort asks the reason to love you? What if there is no reason? Can you abreast the same?
He was debonair engineer but she was small town lass. He had dangling joy but she was from conservative family. He liked her but she loved him. 
Raunak and Juhi come close with a platonic relationship and unwillingly abnegate the desire. Meanwhile, Megha peeps from the past. Love changes their lives and then one day everything turns to unexpected.
Will time heal their lives? Will love enliven them or leave eradicated? Will Megha make the space for everyone? Will their creed in love be judged by crumbled situations? 
Let’s be the part of this heart melting love story and find a reason to love someone.

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Tuesday, August 1, 2017

सोच


सुनो, तुम अक्सर मुझसे मिलने आया करो ना
अच्छा लगता है मुझे तुम्हारे साथ वक़्त बिताना
हाथों में हाथ ले कर सड़क किनारे छाँव में चलना
तुम्हारा मुझे नज़र बचा कर देखना
और एक छोटी सी बात को भी अपने ही ढंग में बयां करना
अच्छा लगता है मुझे तुम्हारे साथ अठखेलियां करना
तुम्हारे दिए उस कॉफ़ी के मग में छपी अपनी तस्वीर देखना
तुम्हारे हर बिखरे लफ्ज़ से खुद को समेट लेना
किसी संगीत की धुन में तुम्हे याद कर लेना
और फिर ख्वाबों में सदियों तलक बातें करना
अच्छा लगता है मुझे तुम्हे अपनी रूह में रखना
पानी पड़ने पर मिट्टी की खुशबु तो महसूस की होगी ना तुमने कभी?
कुछ ऐसा ही हाल होता है मेरे दिल का तुमसे मिलने पर
तुम्हे हर्फ़ हर्फ़ अपने होठों में रख लेना
अच्छा लगता है मुझे तुम्हे बाहों में भर लेना
दर्द में जब भींच लेते हो तुम मुझे अपने सीने में कहीं
उस लम्हे धड़कनों के शोर बेचैन कर देते हैं मुझे
हूँ किसी अपने की बाहों में खुद को कुछ ऐसी तसल्ली देना
अच्छा लगता है मुझे तुम्हें अपनी मुहब्बत कहना 

Thursday, July 20, 2017

आरज़ू



कुछ अटपटे से ख्याल आ रहे हैं
तुम आ कर सम्हाल लो ना मुझे
दिन कुछ बिखरा बिखरा ही गुजरा मेरा आज
रातों में कुछ अपना ख्याल दो ना मुझे
ढलती शाम की धूप में कुछ बेरुखी महसूस हुई मुझे
ये कैसी अंजुमन है, बाहर निकाल दो ना मुझे
दो बरस से धड़कनो ने जान निकाल दी है मेरी
छुपा है क्या अंदर, खंगाल दो ना मुझे
नहीं है चाह की कोई टूट कर चाहे मुझे
रंगों में रंग गुलाल दो मुझे
किस आग ने मुझे तपा रखा है कश्मकश में ?
राख कर दूँ आज सब कुछ
एक ऐसी मशाल दो ना मुझे
तुम्हारे हाथों की छुअन याद आने लगी है
अपने घर के किसी कोने में डाल दो ना मुझे
है शक़ मुझे की तुम सिर्फ मेरे हो
अब इस झूठ के जाल से निकाल दो ना मुझे
देखो दिलों का रूठना तो चलता ही रहेगा
किसी रोज़ किस्मत का टक्साल दो ना मुझे

टक्साल - वह स्थान जहाँ सिक्के ढलते हों;

- कमल पनेरू

Wednesday, June 28, 2017

बेचैनी



हाँ तुम्हारे यूँ दूर चले जाने से
एक शख्स मेरे अंदर उदास बैठा है
अलविदा नहीं होते अक्सर खुशमिज़ाज़ अंदाज़ के
यही सोच कर आँखों के बहुत पास बैठा है
तुम्हारे हाथों का वो कोमल सा स्पर्श
और मेरी हर बात पर होठों पर एक प्यारी सी हसी
तुम्हारा यूँ हर दफ़ा कुछ ना कुछ तोहफे देना
मेरे हर बार रूठ जाने पर चंद पलों में मना लेना
यही कुछ यादें समेट रहा हूँ वक़्त से
वक़्त है कि ओढ़ कर लिबास बैठा है
महसूस की थी मैंने तेरे दिल में वो कसक उस शाम
जो मुझे इत्मिनान से गले लगा कर पूरी होनी थी
और वो नज़रो से ही दूर तक साथ आना
ये अधूरा ही रह गया था
मुहब्बत आज बेचैन सी थी तेरे मेरे दरमियाँ
जोड़ लूँ सब लम्हे तेरे साथ में
की करने अब ये दिल नए कयास बैठा है
तेरे होठों पर मेरा नाम कांपता सा रह गया
पर तेरा चेहरा था कि सारा दर्द कह गया
थी आज खामोशियों के पास चीख़ती हुई जुबां
पर ये दिल था जो सब कुछ सह गया
कुछ अरमान और भी जगते हैं अब दिल में
जो झंझोड़ देते हैं मेरी रूह को
तड़प जाता हूँ मैं तुम्हे साथ ना सोच कर
मानो खुदा भी करने मुझसे अट्हास बैठा है 
हाँ तुम्हारे यूँ दूर चले जाने से
एक शख्स मेरे अंदर उदास बैठा है

- कमल पनेरू





Sunday, June 25, 2017

तसल्ली


कुछ अलसायी सी शामें फिर से दस्तक दे रही हैं
मैंने दरवाजो पर हुई वो धीमी सी आहट सुन ली है
होंगी जरूर वही पुरानी तुमसे लिपटी यादें
ये सोच कर मैं अंदर कहीं छुप गया हूँ
आज फिर धड़कन तेज़ होने लगी है
सोचता हूँ तुम आओ कभी और देखो
मेरे घर की पुरानी  दीवारें
जिनमे तुम्हारी अनगिनत तसवीरें हैं
वो किनारे पर लगाया तुलसी का पौधा
अब भी तुम्हारे हाथ से पानी मिलने के इंतज़ार में है
और अमरुद की डाली पर लटका वो टूटा सा झूला
मानो नाराज़ है अब तुम्हे ना पा कर
घर के आँगन पर अब धुप खिलती ही कहाँ है
वो रंग वो चमक न घर में है और न मेरे चेहरे पर
हाँ जहन में कुछ निशाँ हैं तुम्हारे चले जाने के
और एक उम्मीद है इन यादों के साथ तुम्हारे लौट आने की
साथ ही है झूटी तसल्ली की तुम अब भी मेरे हो!
- कमल पनेरु

Wednesday, June 14, 2017

थोड़ा मुस्कुरा दो ना


क्यूँ शांत से बैठे हो आज
थोड़ा मुस्कुरा दो ना
दिन भर की थकान से टूट गया है ये बदन
ये थकान मिटा दो ना
अक्सर होते हैं तुम्हारी खामोशियों में किस्से हज़ार
मुझे आज वो किस्से दो चार सुना दो ना
ऐसा सन्नाटा पहले कभी दरमियान नहीं रहा
अपनी फिर से वो आवाज़ सुना दो ना
मुहब्बत नहीं होती किसी फ़कीर की दुआ की मोहताज़
तुमसे ही सीखा है मैंने
की तुम खिलखिला के हँस पड़ो फिर से
मुझे ये अंदाज़ सीखा दो ना
गज़ब का फासला आ खड़ा हुआ है दो पल के दौरान
नज़दीकियाँ कैसे होती हैं मेहरबान सीखा दो ना
आज दोस्तों में कुछ जिक्र सा हुआ था तुम्हारा
मैं सहसहा खिलखिला पड़ा था लाज से
तुमने बिताया कैसे दिन मेरे बगैर
चंद लब्ज़ों में ये बात बता दो ना
क्यूँ शांत से बैठे हो आज
थोड़ा मुस्कुरा दो ना
       
- कमल पनेरू